* तालाब खोदने पश्चात भी प्यासे जानवर
* जल खोजते आ रहे रिहायशी इलाकों में
कोरबा (मंथन) कोरबा-चांपा सड़क मार्ग के मड़वारानी जंगलों में बने तालाबों को देखकर अब रेगिस्तान के ऊंटों को भी अपने भविष्य की चिंता होने लगी है। संबंधित विभाग ने जंगल में वन्य प्राणियों की प्यास बुझाने के लिए ऐसी शानदार संरचनाएं खड़ी की हैं, जिन्हें देखकर प्यास बुझना तो दूर, खुद पानी भी अपना रास्ता भूल गया है।
* शासकीय फाइलों में बाढ़, जमीन पर अकाल
जानकारी के अनुसार करतला रेंज अंतर्गत आने वाले मड़वारानी क्षेत्र में पिछले सालों में कागजों पर पानी की ऐसी लहर दौड़ाई गई कि लगा अब जानवरों को ‘स्विमिंग पूल’ की सुविधा मिलेगी। दावा किया गया था कि ये तालाब साल भर लबालब रहेंगे। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन ढांचों ने ठंड से लेकर अब तक पानी की एक बूंद नहीं देखी। शायद संबंधित विभाग ने इन्हें ‘वाटर हार्वेस्टिंग’ के बजाय ‘धूल हार्वेस्टिंग’ के लिए बनाया है।
जब जंगल में वन्य प्राणियो के गले सूखने लगते हैं, तो बेबस वन्य प्राणी रिहायशी क्षेत्रों की ओर जल की खोज में रुख करते हैं। यहाँ उनका स्वागत करने के लिए संबंधित विभाग के ‘अघोषित बॉडीगार्ड्स’ (शावकों के झुंड) तैनात रहते हैं। प्यासे चीतलों को जल तो नहीं मिलता, लेकिन स्वानो के दांत और तेज रफ्तार गाड़ियाँ उन्हें ‘इंसाफ’ जरूर दिला देती हैं। मड़वारानी, खरहरी और बरपाली के जंगलों से आए दिन वन्य जीवों की लाशें उठ रही हैं, लेकिन विभाग इसे ‘प्राकृतिक प्रक्रिया’ मानकर चैन की नींद सो रहा है।
एसईसीएल की मानिकपुर खदान के लिए 194.728 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन के बदले जो भारी-भरकम बजट मिला, वह कक्ष क्रमांक P-1165 और P-1164 की बोरिंग और सासर पीट में कहीं ‘दफन’ हो गया है। 2024-25 की इस परियोजना में कागजों पर तो बोर खनन और जल आपूर्ति का काम जोर-शोर से चल रहा है, लेकिन धरातल पर जानवर अब भी ‘वाटर फिल्टर’ की नहीं, बस दो बूंद जिंदगी की तलाश में हैं।
19 अप्रैल / मंथन मित्तल



