* निजी विद्यालयो की मॉनिटरिंग व्यवस्था सवालों के घेरे में
कोरबा (मंथन) जिस देश की शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी, उस देश का भविष्य भी मजबूत नहीं हो सकता। आज के बच्चे ही कल के युवा हैं और यही युवा आगे चलकर देश की अर्थव्यवस्था, प्रशासन, विज्ञान, तकनीक और सामाजिक विकास में अपनी भूमिका निभाएंगे। ऐसे में शिक्षा केवल पढ़ाई का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण नींव है।
लेकिन विडंबना यह है कि तमाम शासकीय योजनाओं, करोड़ों रुपये के बजट और शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के दावों के बावजूद देश में शिक्षा का स्तर आज भी कई सवालों के घेरे में है।
सरकार शासकीय विद्यालय में भवन, स्मार्ट क्लास, शिक्षण सामग्री, छात्रवृत्ति, मध्यान्ह भोजन सहित अनेक योजनाओं पर बड़ी राशि खर्च कर रही है। इसके बावजूद कई स्थानों से शिक्षकों की समय पर विद्यालय नहीं पहुंचने, नियमित कक्षाएं नहीं लगने और विद्यालयो की व्यवस्थाओं में लापरवाही की शिकायतें सामने आती रहती हैं।
शिक्षा का मंदिर तभी मजबूत होगा, जब वहां पढ़ाने वाले शिक्षक भी अपनी जिम्मेदारी को पूरी गंभीरता से निभाएं। शासकीय विद्यालय किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता के पैसे से संचालित सार्वजनिक संस्थान हैं। इसलिए यहां जवाबदेही और निगरानी दोनों आवश्यक हैं।
परंतु निजी विद्यालयो की व्यवस्था को लेकर अभिभावकों की अपनी परेशानियां हैं। फीस, अलग-अलग शुल्क, किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य खर्चों का बोझ लगातार परिवारों पर बढ़ता जा रहा है।
कोरबा जिले में भी अभिभावकों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि जब विद्यालयो में लंबे समय तक ग्रीष्मकालीन अवकाश रहता है, तब उस अवधि की फीस किस आधार पर ली जाती है ? यदि किसी निजी विद्यालय में अप्रैल से मार्च तक 12 महीने की फीस निर्धारित है और जून जैसे अवकाश वाले महीने में भी मासिक फीस ली जाती है, तो अभिभावकों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि यह फीस किस स्वीकृत फीस संरचना और किस नियम के तहत निर्धारित की गई है। यहां सवाल केवल फीस देने या नहीं देने का नहीं है। सवाल फीस निर्धारण में पारदर्शिता, नियमों के पालन और अभिभावकों के अधिकारों का है। जरूरत इस बात की भी है कि शिक्षा विभाग विद्यालयो की नियमित मॉनिटरिंग करे, फीस संरचना की जांच करे और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कार्यवाही सुनिश्चित करे।
26 अगस्त / मंथन मित्तल





