कोरबा (मंथन) अक्सर शासकीय सिस्टम अंतर्गत अधिकारियो की छवि ठंडे कार्यालयों और फाइलों तक सीमित रहती है, लेकिन कोरबा जिला कलेक्टर कुणाल दुदावत ने इस धारणा को पहले ही कुछ दिनों में बदल दिया है। जिले की कमान संभालते ही उन्होंने संदेश साफ कर दिया है की “प्रशासन वहां होगा, जहां जनता होगी।”
* पगडंडियों का सफर और चौपाल की चर्चा
कलेक्टर दुदावत का ध्यान केवल शहर की चकाचौंध तक सीमित नहीं है। वे उन दूरस्थ वनांचलों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर खुद अपनी गाड़ी से पहुँच रहे हैं, जहाँ विकास की पहुँच अब तक धीमी रही है।
* हकीकत की जांच
वे गाँव की गलियों और चौबारों पर रुककर सीधे ग्रामीणों से मिल रहे हैं। खेतों की मेड़ पर खड़े होकर किसानों से उनकी समस्याओं पर चर्चा करना और मौके पर ही अधिकारियों को निराकरण के निर्देश देना उनकी कार्यशैली का खास हिस्सा बन गया है।
* लापरवाही पर ‘नो टॉलरेंस’
कोरबा जिला कलेक्टर का यह दौरा केवल औपचारिकता नहीं है। निर्माण कार्यों के निरीक्षण के दौरान जहाँ भी गुणवत्ता में कमी या काम में देरी दिख रही है, वहां अधिकारियों और ठेकेदारों को सख्त फटकार का सामना करना पड़ रहा है। उनका रुख स्पष्ट है की शासकीय धन का एक-एक पैसा जनता के काम आना चाहिए।
उनका पूरा जोर जिले की चार बुनियादी स्तंभों पर है, जिसमे विद्यालयो में शिक्षकों की उपस्थिति और बच्चों की पढ़ाई, दूरस्थ ग्रामो में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता, जल जीवन मिशन की जमीनी स्थिति, खराब रास्तों का कायाकल्प आदि हैं।
जानकारों का मानना हैं की प्रशासन का यह ‘जमीनी अंदाज़’ न केवल व्यवस्था में कसावट लाता है, बल्कि आम आदमी के मन में सरकार के प्रति विश्वास भी पैदा करता है। कोरबा को अब एक ऐसे नेतृत्व की उम्मीद है जो एसी कमरों से ज्यादा पसीने वाली पगडंडियों पर भरोसा करता है।
15 अप्रैल / मंथन मित्तल



