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    छत्तीसगढ़

    हाई कोर्ट का अहम फैसला, आदिवासी बेटी को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं, ट्रायल कोर्ट के फैसले को रखा बरकरार

    By Vimal Mittal01/23/2026
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    हाई कोर्ट
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    CG News: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजाति समुदाय की महिला हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं मांग सकती, जब तक यह सिद्ध न किया जाए कि संबंधित जनजाति ने अपनी परंपरागत उत्तराधिकार व्यवस्था त्याग दी है. न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की एकलपीठ ने (आशावती बनाम रुखमणी व अन्य) में 41 साल पुराने नामांतरण (म्यूटेशन) और बंटवारे को चुनौती देने वाली अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया है.

    क्या था पूरा मामला?

    अपीलकर्ता आशावती पिता धरमसिंह ने सिविल कोर्ट में दावा किया था कि उनके पिता स्व. धरमसिंह बरीहा की दो पत्नियां थीं और वे दूसरी पत्नी हरसोवती की पुत्री हैं. उनका कहना था कि 83 एकड़ से अधिक की पैतृक कृषि भूमि में उन्हें बराबर हिस्सा मिलना चाहिए था, लेकिन वर्ष 1971-72 में राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से उनका नाम रिकॉर्ड से हटा दिया गया. आशावती ने आरोप लगाया कि उस समय वे नाबालिग थीं, न तो उन्हें नोटिस दिया गया और न ही सहमति ली गई, इसलिए नामांतरण और बंटवारा अवैध व शून्य है.

    हिंदू कानून के आधार पर नहीं कर सकते दावा – हाई कोर्ट

    हाईकोर्ट ने माना कि, पक्षकार बिंझवार अनुसूचित जनजाति से संबंधित हैं. उन पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू नहीं होता. अपीलकर्ता यह सिद्ध करने में विफल रहीं कि जनजाति ने अपनी परंपरागत उत्तराधिकार प्रणाली छोड़ी है. कोर्ट ने बुटाकी बाई बनाम सुखबती बाई (2014) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आदिवासी बेटी केवल हिंदू कानून के आधार पर पैतृक संपत्ति का दावा नहीं कर सकती.

    41 साल बाद हुआ मुकदमा

    कोर्ट ने यह भी अहम टिप्पणी की कि, वर्ष 1972 में प्रमाणित नामांतरण आदेश को 2013 में चुनौती देना कानूनन अस्वीकार्य है. इतने लंबे समय तक चुप्पी, दावे को समय-सीमा के बाहर ले जाती है. राजस्व रिकॉर्ड दशकों तक लागू रहे हों, तो उन्हें हल्के में खारिज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक लागू रहे नामांतरण आदेश वैध माने जाते हैं, जब तक धोखाधड़ी का ठोस प्रमाण न हो.

    फर्जीवाड़े के भी आरोप साबित नहीं

    अपीलकर्ता यह भी सिद्ध नहीं कर सकीं कि, उनके हस्ताक्षर या अंगूठा निशान फर्जी था. नामांतरण प्रक्रिया में धोखाधड़ी या जबरन सहमति ली गई. इसके उलट रिकॉर्ड से यह सामने आया कि, अपीलकर्ता को भूमि का एक हिस्सा मिला और वे चार दशकों से उस भूमि पर काबिज रहीं. इससे उनकी सहमति और जानकारी स्वतः सिद्ध होती है.

    ट्रायल कोर्ट का फैसला सही

    हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया है. कानून और परंपरागत अधिकारों की भी सही व्याख्या की. उसने किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं की, इसलिए सेक्शन 96 सीपीसी के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता. हाईकोर्ट ने अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया और 23 दिसंबर 2014 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है.

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