कोरबा (मंथन) सत्ता के गलियारों में वफादारी की कसमें खाने वाले जब पीठ में छुरा घोंपते हैं, तो उसकी गूँज बहुत दूर तक जाती है। इसी कड़ी में ओडिशा के राज्यसभा चुनाव में जो ‘नंगा नाच’ हुआ है, उसने साबित कर दिया है कि राजनीति अब सिद्धांतों का अखाड़ा नहीं, बल्कि गद्दारों की मंडी बन चुकी है। नवीन पटनायक जिन्हें अपना सिपाही समझकर मैदान में उतार रहे थे, वे असल में विपक्षी खेमे के ‘स्लीपर सेल’ निकले।
* शर्मनाक ‘अपनों’ ने ही बेची पार्टी की साख
बीजेडी के 8 और कांग्रेस के 3 विधायकों ने जिस तरह अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार की बलि चढ़ाई, वह लोकतंत्र के चेहरे पर करारा तमाचा है। कोई अपने पिता के अपमान का बदला लेने का राग अलाप रहा है, तो किसी को अपनी ही पार्टी का गठबंधन रास नहीं आ रहा। लेकिन सच तो यह है कि ये सिर्फ बहाने हैं, असली खेल तो उस ‘पावर’ और ‘मैनेजमेंट’ का है जिसने इन माननीयों के ईमान को एक झटके में हिला दिया। क्या ये विधायक जनता के भरोसे के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे ?
* कांग्रेस-बीजेडी का बेमेल निकाह और ‘तलाक’ की नौबत
नवीन बाबू और कांग्रेस ने सोचा था कि साथ मिलकर बीजेपी को रोक लेंगे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनके अपने ही घर में ‘आस्तीन के सांप’ पल रहे हैं। ये कैसी विडंबना है कि चुनाव से पहले कसमें खाई गईं और वोटिंग के वक्त खंजर निकाल लिए गए। सौभिक बिस्वाल और देबीरंजन त्रिपाठी जैसे नेताओं ने जो ‘खुल्लम-खुल्ला’ बगावत की है, वह नवीन पटनायक के उस अनुशासन की धज्जियां उड़ा रही है जिसका ढिंढोरा वे सालों से पीटते आए हैं।
* बिहार का सरेंडर और हरियाणा की नौटंकी
बिहार में तो विपक्षी एकता का ऐसा ‘जनाजा’ निकला कि 4 विधायक डर के मारे मैदान ही छोड़ गए। जब लड़ने का दम नहीं था, तो जनता को उम्मीदें क्यों दीं ? उधर हरियाणा में वोटों की गिनती पर मची रार बता रही है कि हार के डर से अब नेता चुनाव आयोग की चौखट पर नाक रगड़ने को मजबूर हैं।
यह सिर्फ एक चुनाव का नतीजा नहीं है, बल्कि उन क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए मौत की घंटी है, जो यह मानकर बैठे थे कि उनके विधायक उनकी जेब में हैं। जब पार्टी का अनुशासन कागज का टुकड़ा बन जाए और विधायक अपनी ही पार्टी की कब्र खोदने लगें, तो समझ लीजिए कि अंत निकट है। नवीन बाबू, अगर अब भी आप नहीं जागे और इन ‘जयचंदों’ का इलाज नहीं किया, तो याद रखिये इतिहास गद्दारों को माफ नहीं करता और जनता वफादारी की अर्थी उठाने वालों को सत्ता से उखाड़ फेंकने में देर नहीं लगाती।
17 मार्च / मंथन मित्तल



