* संरक्षण पर नहीं दिया जा रहा ध्यान
* तेजी से घट रही चार फल के पेड़ों की संख्या
कोरबा (मंथन) कोरबा जिले के दूरस्थ वन क्षेत्र लेमरू, पसरखेत, कोलगा, मदनपुर आदि क्षेत्रों में चार फल के सघन पेड़ थे, जो अब विरल होने लगे हैं। इसका मुख्य कारण पेड़ों की कटाई और लोगों में जागरूकता की कमी बताई जा रही है। लोग पकने से पहले ही चार को तोड़ लेते हैं। इससे जिले में चिरौंजी की खेती खतरे में है। जंगल में चार फल के पेड़ों में आ रही कमी के कारण अब चिरौंजी भी दुर्लभ उपज की श्रेणी में आने लगी है।
आरोप लगाते हुए बताया जा रहा हैं की ग्रामीणों द्वारा चिरौंजी के लालच में चार फल को पकने से पहले ही तोड़ लिया जाता है। इससे नए पौधे पनप नहीं पाते। पेड़ों के संरक्षण के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। शीतल पेय, मीठा सहित विभिन्न खाद्य सामानों का स्वाद बढ़ाने के लिए चिरौंजी का उपयोग किया जाता है। खासतौर पर मीठे में ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है, चिरौंजी ड्रायफूड की श्रेणी में आती है। चिरौंजी 1500 से 1800 रुपये किलो तक बिकती है। ग्रामीण बताते हैं कि एक समय था जब खुले बाजार में चार फल खाने के लिए बिकता था। पके चार फल को खाने का स्वाद अलग होता है, मगर अब चार फल बाजार से गायब हो चुका है। दरअसल, चिरौंजी के लालच में लोग पकने से पहले ही फल को तोड़ लेते हैं। इससे ये अब खाने को नहीं मिलता। पके चार फल को पक्षी खाते हैं और उसके बीज डिस्पार्सल करते हैं। इसी तरह आम लोग भी खाने के बाद बीज को फेक देते हैं, जिससे नए पौधे बनते हैं। मगर, पिछले कुछ सालों से फल को कच्चा ही संग्रहण करने का चलन बढ़ा है, जिसका दुष्परिणाम है कि चार पेड़ों की तादात में लगातार कमी आई है।
जिले के जंगल में साल, सागौन के अलावा विभिन्न प्रजाति के पेड़ मौजूद है। महुआ, तेंदू, डोरी, चार फल सहित अनेकों वनोपज मिलते हैं। आदिवासी ग्रामीण सदियों से इन्हीं वनोपज का संग्रहण कर अपनी जीविका चलाते आ रहे हैं। अच्छी आमदनी भी कमाते हैं। मगर वर्तमान परिवेश में खासकर चार फल के पेड़ में कमी देखी जा रही है, जो चिंता का विषय है। अगर समय रहते चार पेड़ के संरक्षण की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो मिठाई से चिरौंजी गायब हो जाएगी।
30 मार्च / मंथन मित्तल



